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Thursday, March 5, 2015

World Sparrow Day

13
Two-birds-lamppost
Hindi Poem – World Sparrow Day

वो चिड़िया कहाँ गयी …..मेरे आँगन की ?
जो मेरे बचपन में फुदक कर आती थी ,
बैठ मेरी छत की मुंडेर पर ,
वो चीं -चीं का शोर मचाती थी ।

कुछ सालों तक वो मेरे साथ उड़ी ,
कुछ सालों तक मैं उसे तकती रही ,
और फिर अचानक वक़्त की उलझनों में ,
मैं उसे भूल कर …अपनी दुनिया में व्यस्त रही ।

अपनी जिंदगी के चालीस सालों तक ,
मैंने रोज़ आकाश को निहारा ,
सुबह पंछियों को चहचहाते हुए पुकारा ,
और रोज़ की ही भाँति ….आँगन में आये कबूतरों को दाना डाला ।

मैं तब भी न समझ सकी …..
कि कोई हमारी दुनिया से लुप्त हो रहा है ,
इस बढ़ती हुई जनसंख्या में …
कोई अपना अस्तित्व ऐसे खो रहा है ।

और कल रोज़ की ही तरह ….जब मैंने अखबार को उठाया ,
उसे पढ़ने के लिए …..उसके पृष्ठों को पलटाया ,
तो उस नन्ही सी चिड़िया की ……तस्वीर को वहाँ पाकर ,
अपनी खोई हुई याददाश्त को …..सालों पीछे दौड़ाया ।

अचानक से तभी मुझे याद आया ,
कि हुआ करती थी …..एक छोटी चिड़िया आकाश में ,
जिसकी गुमशुदगी छपी थी …..उस दिन के अखबार में ,
जिसे बचाने की गुहार लगाई थी ……राज्य सरकार ने ।

मगर अब वो घोषित हो चुकी थी …..”State Bird Of Delhi”,
और मना रहे थे अब हम उसका … “World Sparrow Day”,
कह रही थी सरकार अब ….कि बचा लो उसको ….अब इन Urban हवायों से ,
जहाँ खो गयी है ….वो ना जाने कहाँ …..इन खूबसूरत फ़िज़ायों से ।

दो अश्रु मेरे भी बह गए …..
उसको इस तरह से अखबार में देखकर ,
जो कभी उन्मुक्त गगन के पंछी थे …..
उनकी लुप्त होती प्रजाति को सोचकर ।

हाँ वो चिड़िया ….याद आई मुझे अचानक,
जी चाहा …. उसको थाम लूँ ,
कैसे …..कहाँ …..कब …खो गयी वो ,
जिसे “State Bird” से अब सम्मान दूँ ।।

A Message To All-
The good old house sparrow,which is becoming rarer by the day , has been declared “State Bird Of Delhi”.
World Sparrow Day is a day designated to raise awareness about the house sparrow and other common birds in urban environment and of threat to their population. World Sparrow Day has a broader vision to provide a platform for nurturing our common birds.
SPARROW……..The State Bird Of Delhi……Nurture and Protect it.

Wednesday, March 4, 2015

A Handful Of Grain


grains-field-blue-sky
Hindi poem on issue of price rise

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने ,
पहले ले जाता था जिन्हें इन्सां ,
झोले में भर कर अनजाने ।

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने |

आज उसका मूल्य है “सोना”…
दिन~ब ~दिन कीमत का रोना ,
दो रोटी खाने को भी अब ,
देखो पड़ गए कितने लाले ।

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने |

जिस “गेहूँ” को धरती उगले ,
उसकी वसूली का कर “सरकार” चुगले ,
जनता रह गयी भूखे पेट यहाँ पर ,
हज़म न हुए उसकी कीमत के माने ।

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने |

पहले गेहूँ और बाली ….
हो जाती थी खेतों से खाली ,
अब तो खेत वाला ही देखो ,
कुछ दानों के लिए देता गाली ।

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने |

बच्चे डरते अब खेत में जाते ,
पहले हर बाली में वो छिपते थे जाके ,
अब नहीं बचा वहाँ कोई खेल ही बाकी ,
हर बाली की कीमत क्योंकि अब आँकी जाती ।

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने |

पहले जलती थी “होली” में गेहूं और बाली ,
अब जलते सिर्फ अरमान ही खाली ,
क्या करे किसान बेचारा …..
त्यौहार पर कैसे कर दे अपने घर को खाली।

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने |

क्या होगा भविष्य उन दानों का ….
जिन्हें मुट्ठी भी नसीब न होगी अब गिराने को ,
कृषि देश “भारत” को कैसे दिखाएँगे ,
उन तस्वीरों में ….जो हमारी “हरित क्रान्ति” दर्शाएंगे ।

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने |

शहरों में तो बन गया बहाना ,
चार रोटी के बदले अब दो ही खाना ,
कहते हैं की रोटी होती है मोटी ,
जिसको खाने से चर्बी जमा होती ।

मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
बन गए देखो कितने सयाने |

पेट भरने का इसलिए ढूँढा ….अब एक नया विकल्प ,
मैदा से बने Pizza ,Burger …..हो रहे सफल ,
क्योंकि मुट्ठीभर अनाज के दाने …..
सयाने बनकर हो गए अब बेगाने ।।

Friday, February 27, 2015

Ek Aas

Two-Hindi-Poems-flower-black-tree


1.Ek Aas – Hindi Poem


पेड़ो से पूछा मैंने……
यू ही एक रोज़,
क्यों नहीं है तुम में अब वो पहले जैसा जोश?

क्यों नहीं बैठ कर तुम्हारे नीचे,
नहीं आती वो पहले जैसी बात?
जब शाम ढला करती थी ….
न जाने हो जाती थी कब रात?

क्यों नहीं अब कर पाती, मै फिर से तुमसे बात?
मस्ती भी अब छूट गयी,जब होती है बरसात |
डर लगता है अब चदते हुए ,कोई भी हो शाख…
घबरा कर दिल ये कहता है कि, हो जायूँगी मै राख |

अगर तुम्हे बनना ही था,ऐसा निर्दय कठोर….
तो अच्छा है अब चले जाओ तुम,इस Delhi को छोड़ |
तुमसे है परेशान यहाँ पर, भी सारे इंसान….
रहने कि जगह कम है, और तुम बन रहे हो भगवान् |

सुनकर मेरी व्यथा को मुझसे,पेड़ थोडा मुस्कुराया,
फिर प्यार से उसने हंसकर मुझपर, हवा का झोंका एक लहराया…..
बोला धीमे से मेरे कान में -सुनो मेरे बदलने का वो राज़,
जिसको सुनकर हंसेगा सारा, निर्दय मानव समाज |

जोश मेरा वो पहले जैसा खोया यंही है देखो …….
“प्रदूषण” के काले धुएँ से ,बिखरे रंग अनेको,
मै क्या करता धीरे-धीरे ,कच्ची हो गयी मेरी शाख,
नाम का पेड़ बनकर रह गया अब ,रखता हूँ “Museum ” में सजने कि एक आस ||

2. Parents – Hindi Poem

[ एक आस - बच्चो की सोच के आगे सबसे ख़ास ]

काश कभी ऐसा भी हो ,कि पेड बने एक कंप्यूटर,
जिसके नीचे बैठ कर मै, खेलूँ सारा दिन जी भर |

घर पर जब भी सिस्टम चलाता,माँ-पापा कि डांटे खाता,
Chatting करते पकड़ा जाता ,facebook पर मै दिन भर ||

कह दूंगा कि मै पढने गया था ,आज फिर से पार्क में ,,
oxygen कि कमी थी घर में,लेने गया था ठंडी सांस मै,

तुम भी तो जब हुआ….. करते थे बच्चे,जाते थे न पार्क में ?
पेड़ के नीचे बैठ कर,लव -लैटर लिखा करते थे साथ में ,

ज़माने  के साथ चलो mummy -daddy , मत टोको मुझे यूँ हर बात में ,
बिजली के बिल कि हालत देखो ,में लगा हूँ उसे बचाने ……पेड के नीचे पार्क में,

बेचारे ये जान न पाते…. कि पेड नहीं, अब सिस्टम है मेरे हाथ में,
मेरी भोली सी सूरत पर ,होती उनको भी “एक आस “……… मेरी कही हर एक बात में ||