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Saturday, January 30, 2016

Chehra







This Hindi poem highlights the feelings of a female writer when one of her buddy online friend demanded to see her face via online and due to her innocent thoughts she agreed for the same but after that she felt very     tensed and depressed and thought that why faces are so important in life instead of one's real presence.







ना जाने क्यों लोग  ....... चेहरों से दिल लगाते हैं ,
चेहरा ना देखने पर  ........ खुद को "दीवार" से बातें करते हुए पाते हैं । 

हमसे भी एक शख्स ने  .....  जब "चेहरा" देखने की फरमाइश की ,
तब बिना हँसे हमने  .......... अपने चेहरे पर एक छींटाकशी करी । 

कि क्या है इस चेहरे में ऐसा भला  .......... जो एक वजूद को था उसने नकारा ,
और क्या हो गया अब ऐसा भला  .......... जो चेहरा देखते ही उसने था हमें पुकारा । 


ना जाने क्यों लोग  ....... चेहरों से दिल लगाते हैं  .......... 


वो खुश था ये जान अब  .......... कि हम एक ज़िंदा इंसान है कहीं ,
हम दुखी थे ये सोच तब  ..........कि क्यूँ हम बने नादान   ...... बात मान उसकी कही । 

चेहरा तो सिर्फ एक पहचान है  ........... जो एक सुकून का एहसास देता है ,
असली मुद्दा तो आकर के  ...... कहीं और ही जनम लेता है । 


यहाँ जन्म उस चेहरे से ज्यादा  ........ उन ख्यालों का उस वक़्त हुआ था ,
जहाँ पर इस चेहरे के बिना  ......... उस शख्स ने मेरे वजूद का खून किया था । 


ना जाने क्यों लोग  ....... चेहरों से दिल लगाते हैं  .......... 


जी तो चाहता है मेरा  ....... कि आग लगा दूँ अपने चेहरे पर आज ,
ताकि फिर कोई शख्स ये ना कहे  ......... कि क्यूँ हो तुम गुमनाम गलियों की सरताज़ ?

याद रहे कि "चेहरे" पर लिखी भाषा  ......... कभी एक ख्वाब नहीं बुनती ,
क्योंकि "चेहरे" तो झूठे होते हैं  ......... और उनसे निकली आवाज़ अक्सर होती झूठी । 

वो शख्स ना जाने मेरा "चेहरा" देख  ........... क्या-क्या अनुमान लगा गया ?
कि खुद अपने चेहरे को तस्वीर में देख  .......... मेरी तस्वीर को पसीना आ गया । 


ना जाने क्यों लोग  ....... चेहरों से दिल लगाते हैं ,
चेहरा ना देखने पर  ........ खुद को "दीवार" से बातें करते हुए पाते हैं ।।  



Wednesday, March 4, 2015

Meri Pehchaan



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Hindi Poem – Meri Pehchaan

हर रोज़ मेरी “पहचान” ….कहीं लुप्त हो जाती है ,
मैं एक “लेख” लिखती हूँ ……
और अगले दिन न जाने ….
कितने नए लेखों की ,एक परत उस पर जम जाती है ।

मैं रोज़ इसी उधेड़ -बुन में ….
अपनी “पहचान” की अभिलाषा से …..
फिर से कदम बढ़ाती हूँ ……..
जिंदगी की रेस में ….बस भागती ही जाती हूँ ।

ये सोच कर कि ……आज गिर गए तो क्या हुआ ?
कल फिर से उठेगा …..धीरे-धीरे से धुआँ ,
आग लग गयी मेरे “आशियाने” में आज ……ये सोचकर ,
मैं उस आग को बुझाने की ……नयी तरकीब लगाती हूँ ।

जिस दिन मैंने …..अपनी “नयी सोच” को … न हवा दी ,
उस दिन मेरी सोच ने ही ……मुझको ऐसी सज़ा दी ,
मैं अपनी सोच पर पड़ी …..हर गर्त को हटाती हूँ ,
कि वो मेरी “पहचान” थी …..जिसे मैं गले लगाती हूँ ।

हम जीते हैं तो सिर्फ …. एक “पहचान ” के लिए ,
एक नाम के लिए …एक शान के लिए ,
रोज़ रेत में दबते हैं ……ऊँचाइयों को छूने की खातिर ,
फिर उसी रेत से खोजते हैं …….क़दमों के निशान ……बनके शातिर ।

इसलिए अपनी “पहचान ” को …..कभी खोने न देना ,
दब-दब के विचारों में भी ……..उसे सोने न देना ,
इतिहास गवाह है – हर उन “पहचान” बनाने वालो का ,
जिनके चेहरे से …. ज्यादा दीवाने हैं   ….”जिन्दा ख्याल “……उन मतवालों का ।

ऊँची सोच …..ऊँचे विचार ……जब भी हम मन में लाएँगे ,
लाख कोशिशों के बाद भी ……दबने यूँ न पाएँगे ,
“संघर्ष” करने की ललक ……जब तक तन में जिंदा रहेगी ,
तब तक आने वाली पीढ़ी से ……ये पुरानी पीढ़ी लड़ती रहेगी ।

मुझे भी रोज़ लड़-लड़ कर ….अपनी “एक पहचान” बनानी है ,
अपने लिखे “लेख” को … दबने से पहले ही …उस पर एक और नए “लेख” की परत चढ़ानी है ,
जब तक मेरी पहचान को ….पहचानने वाला न कोई आएगा ,
तब तक मेरे हर “लेख” से ……मेरे नाम का Copyright बनता जाएगा ।।

A Message To All-
Never Lose “Yourself”…….As Every New soul has its own Role.